कर्णप्रयाग: वर्ष 2013 में आयी विनाशकारी दैवीय आपदा से प्रदेश के कई हिस्सो का संपर्क एक दुसरे से अलग हो गया था। पिण्डरघाटी में भी इस विनाशकारी दैवीय आपदा से कई रास्ते एंव झुला पुल क्षतिग्रस्त हो गये थें। लेकिन सरकार के लचर रवैये के कारण आज भी ग्रामीणो की मुसीबते जस की तस है। पिण्डरघाटी के देवाल से कर्णप्रयाग तक आपदा से क्षतिग्रस्त पाॅच पुलो का निर्माण कार्य ना होने के कारण 150 गाॅव के ग्रामीणो को इसका खामियाजा भुगतना पड रहा है। जून 2013 में आयी आपदा ने देवाल के सुपलीगाड एंव बोरागाड, थराली के चेपडो एंव हरमनी, नारायणबगड में मुख्य बाजार में बना झुला पुल बहा दिया था। जिसके बाद से ग्रामीण अस्थायी पुलिया, ट्राली, नदियाॅ एव लम्बे आवाजाही करने को मजबुर है।
सरकार के मुखिया जहाॅ पुलो की जल्द निर्माण की बात कह रहे है वही अधिकारीयो की हिलाहवली से आपदा के ढाई साल बाद भी झुला पुलो का कार्य टेंडर प्रकिया तक सिमटा है। हालाॅकि वैक्लपिक व्यव्स्था के तौर पर हस्तचालित ट्राली लगाई गयी थी लेकिन ट्राली खिचने में लोगो की उगुलिया जख्मी हो चुकी थी जिसके बाद विभाग ने बोरागाड़ और चेपड़ों में करीब 65 लाख की लागत से स्वचालित ट्रालियां लगाईं इनमें भी तकनीकी खराबी होने लगी। हालांकि पुलों के निर्माण के लिए विश्व बैंक डिवीजन को करोड़ों की धनराशि शासन से अवमुक्त हुई लेकिन पुल आज तक नहीं बने। स्थानीय ग्रामीण ढाई साल बाद भी नदी पर लकड़ियो ओर तख्ते बिछाकर या लंबे आवाजाही के लिए मजबूर है क्षेत्रीय ग्रामीण लगातार झूला पुलों की मरम्मत की मांग कर रहे हैं, लेकिन शासन.प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। पिंडर घाटी के लिंगड़ी, त्रिकोट, सेरा, विजयपुर, अश्रुं, बाघाखेत,बुड़जोला, ओडर, हड़ाप समेत 150 से अधिक गांव की 1500 आबादी इसका खामियाजा भुगत रही है। नारायणबगड़ में जहाँ ग्रामीण दो से ढाई किमी घूम कर जा रहे है वही चेपड़ियों में पंद्रह किमी चल कर ग्रामीण अपने गाँव पहुच रहे है। क्षेत्रीय ग्रामीणो में जहा सरकार के प्रति आक्रोश दिखाई दे रहा है वही स्थानीय जनप्रतिनिधि हमेशा सरकारी प्रक्रिया के दुहाई देते नजर आ रहे है।






